Monday, September 14, 2020

राष्ट्रीय नीति आयोग - घोषणा पत्र www.rashtriyanitiayog.com

ये विचार नहीं, 
सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त आधारित 
"राष्ट्रवाद की मुख्यधारा" और "राष्ट्र निर्माण की सर्वोच्च योजना" है

शुक्रवार, 26 अगस्त, 2016 ई0

भारत को अब क्रमिक विकास की नहीं कायाकल्प की जरूरत है। यह तब तक संभव नहीं जब तक प्रशासनिक प्रणाली में आमूल-चूल परिवर्तन न हो। लिहाजा नई सोच, नई संस्थान और नई तकनीकी अपनानी होगी। 19वीं सदी के प्रशासनिक प्रणाली के साथ 21वीं सदी में नहीं प्रवेश किया जा सकता है। रत्ती-रत्ती प्रगति से काम नहीं चलेगा। यदि भारत को परिवर्तन की चुनौतियों से निपटना है तो हमें हर स्तर पर बदलाव लाना होगा। हमें कानूनों में बदलाव करना है, अनावश्यक औपचारिकताओं को समाप्त करना है, प्रक्रियाओं को तेज करना है और प्रौद्योगिकी अपनानी है। मानसिकता में भी बदलाव लानी है और यह तभी हो सकता है जब विचार परिवर्तनकारी हों। (नीति आयोग की ओर से आयोजित ”भारत परिवर्तन व्याख्यान” के शुभारम्भ में, नई दिल्ली में)

- श्री नरेन्द्र मोदी, प्रधानमंत्री, भारत

प्रिय भारतीय साथियों,

”सृष्टि” का अर्थ होता है- सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की रुकी स्थिति के आगे एकात्मता के साथ नवनिर्माण। ”सृष्टि करने की स्थिति“ में भूतकाल की चर्चा की स्थिति आ जाने पर उसे ”सृष्टि रूकना“ कहते हैं ऐसी ही स्थिति महाभारत युद्ध के समय श्रीकृष्ण के समक्ष आ गया था जब अर्जुन ने युद्ध से मना कर दिया था परिणामस्वरूप श्रीकृष्ण ”गीता“ उपदेश के लिए भूतकाल की चर्चा में उलझ गये थे। ”रचना” का अर्थ होता है- उपलब्धता पर आधारित एकात्मता के साथ नवनिर्माण। ”विकास” का अर्थ होता है- उपलब्धता पर आधारित नवनिर्माण। विकास का कोई लक्ष्य नहीं होता। जब विकास एकात्मता की ओर होती है तो वह रचना बन जाती है। विकास लक्ष्य विहिन होता है इसलिए कालान्तर में वह विनाश का रुप ले लेती है।

प्रत्येक नागरिक का अपने देश के प्रति यह कर्तव्य भी होता है कि वह अपने देश को कैसे महानत उँचाई की ओर ले जाये? इसके लिए हम सभी को केवल सरकारों पर ही निर्भर नहीं रहना चाहिए बल्कि ऐसे मुद्दे जो नुकसान कम और अधिक लाभदायक हों उसे समाज/सरकार के समक्ष प्रस्तुत भी करना चाहिए।

राष्ट्रीय नीति आयोग (रा.नी.आ), कोई संगठन/पार्टी नहीं है यह केवल ऐसे मुद्दों को घोषित करने या समाज/सरकार के समक्ष वेबसाइट के माध्यम से लाने का एक मंच है जिससे हम सभी अपने देश को और नागरिकों को और भी अच्छा करने की ओर ले जा सकें।

राष्ट्रीय नीति आयोग (रा.नी.आ), के वेबसाइट www.rashtriyanitiayog.com पर पंजीकरण करें और हमारे संसदीय/विधययक क्षेत्र में जाकर हमें चुनकर अपना समर्थन दें, यही आपसे निवेदन है।

धन्यवाद

आपकी सेवा के लिए सदैव तत्पर

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बुधवार, 31 अगस्त, 2016 ई0
प्रधानमंत्री ने भी भारत के कायाकल्प के लिए अंतरनिहित सिद्धांतों को स्पष्ट किया है। उन्होंने हजारों वर्षों से चली आ रही भारतीय परंपराओं से अनुभव हासिल करने वाले विशेषज्ञों, जनता के सुझावों और विपरीत विचारों को ध्यानपूर्वक सुनने का सुझाव दिया है। यदि हमने ऐसा कर दिया तो हम नीतियों और योजनाओं को न सिर्फ विफल होने से बचा लेंगे, बल्कि भविष्य के जोखिमों से भी इन्हें सुरक्षित कर देंगे। इन सबका अर्थ है भविष्य की योजनाओं और विकास के लिए जरूरी बुनियादी बातों को फिर से परिभाषित करना और उन्हें नए रूप में रचना। इसके लिए सोच के एक नए स्तर की जरूरत होती है। यह किस तरह होगा, यह बहुत कुछ आयोग की टीम की रूपरेखा और दृष्टिकोण पर निर्भर करेगा। प्रधानमंत्री ने नीति आयोग की टीम के लिए महत्वपूर्ण दिशानिर्देश तय किए हैं। अब नीति आयोग पर निर्भर करता है कि वह आशाओं के अनुरूप आचरण करे और परिणाम दे। 
(”अगली सदी की तैयारी“ शीर्षक से दैनिक जागरण में प्रकाशित लेख) 
-मुरली मनोहर जोशी
एक भारत - श्रेष्ठ भारत के निर्माण के लिए आवश्यक कार्य

  आचार्य रजनीश “ओशो” की वाणी है - “इस देश को कुछ बाते समझनी होगी। एक तो इस देश को यह बात समझनी होगी कि तुम्हारी परेशानियों, तुम्हारी गरीबी, तुम्हारी मुसीबतों, तुम्हारी दीनता के बहुत कुछ कारण तुम्हारे अंध विश्वासों में है, कम से कम डेढ़ हजार साल पिछे घिसट रहा है। ये डेढ़ हजार साल पूरे होने जरूरी है। भारत को खिंचकर आधुनिक बनाना जरूरी है। मेरी उत्सुकता है कि इस देश का सौभाग्य खुले, यह देश भी खुशहाल हो, यह देश भी समृद्ध हो। क्योंकि समृद्ध हो यह देश तो फिर राम की धुन गुंजे, समृद्ध हो यह देश तो फिर लोग गीत गाँये, प्रभु की प्रार्थना करें। समृद्ध हो यह देश तो मंदिर की घंटिया फिर बजे, पूजा के थाल फिर सजे। समृद्ध हो यह देश तो फिर बाँसुरी बजे कृष्ण की, फिर रास रचे!”
  भारत को सम्पूर्ण क्रान्ति की जरूरत है। क्रान्ति के प्रति विचार यह है कि- “राजनीतिक, आर्थिक व सामाजिक परिस्थिति में उसकी स्वस्थता के लिए परिवर्तन ही क्रान्ति है, और यह तभी मानी जायेगी जब उसके मूल्यों, मान्यताओं, पद्धतियों और सम्बन्धों की जगह नये मूल्य, मान्यता, पद्धति और सम्बन्ध स्थापित हों। अर्थात क्रान्ति के लिए वर्तमान व्यवस्था की स्वस्थता के लिए नयी व्यवस्था स्थापित करनी होगी। यदि व्यवस्था परिवर्तन के आन्दोलन में विवेक नहीं हो, केवल भावना हो तो वह आन्दोलन हिंसक हो जाता है। हिंसा से कभी व्यवस्था नहीं बदलती, केवल सत्ता पर बैठने वाले लोग बदलते है। हिंसा में विवेक नहीं उन्माद होता है। उन्माद से विद्रोह होता है क्रान्ति नहीं। क्रान्ति में नयी व्यवस्था का दर्शन - शास्त्र होता है अर्थात क्रान्ति का लक्ष्य होता है और उस लक्ष्य के अनुरुप उसे प्राप्त करने की योजना होती है। दर्शन के अभाव में क्रान्ति का कोई लक्ष्य नहीं होता।” 
  सम्पूर्ण क्रान्ति से हमारा तात्पर्य सभी विषयों के अपने सत्य अर्थों में स्थापना से है। जो आपके शब्दों में “आध्यात्मिक एवं दार्शनिक विरासत के आधार पर एक भारत - श्रेष्ठ भारत” है। लोकतन्त्र से हम राजतन्त्र में नहीं जा सकते इसलिए व्यवस्था परिवर्तन का अर्थ ही निरर्थक है। आवश्यकता है वर्तमान लोकतन्त्र व्यवस्था को ही सत्य आधारित करने की जिसे व्यवस्था सत्यीकरण कहा जा सकता है। इस कार्य में हमें मानकशास्त्र की आवश्यकता है जिससे तोल कर यह देख सके कि इस लोकतन्त्र व्यवस्था में कहाँ सुधार करने से सत्यीकरण हो जायेगा। यह मानकशास्त्र ही “विश्वशास्त्र” है। जो भारत के तेज विकास सहित कायाकल्प का प्रारूप है। तेज विकास वही देश कर सकता है जहाँ के नागरिक अपने देश के प्रति समर्पित हों और कम से कम उनका मस्तिष्क देश स्तर तक व्यापक हो। संकुचित मस्तिष्क को व्यापक करने से ही वह वर्तमान में आ पायेगा। इन सब उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए मूल रूप में निम्नलिखित कार्य करने आवश्यक हैं जो आध्यात्मिक एवं दार्शनिक विरासत का सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त रूप है-

अ. भारत के विश्व गुरू बनने के लिए

  “सम्पूर्ण मानक” अर्थात विश्वमानक - शून्य श्रंखला (WS-0)  की विश्वव्यापी स्थापना।

अधिकतम प्रभावी लाभ – विश्व विकास की मुख्यधारा का निर्धारण करते हुये भारत का विश्व के प्रति दायित्व - नव विश्व निर्माण और मानवता की अगली पीढ़ी के उदय को पूर्ण करते हुये दृश्य काल में भारत अपनी गुरूता को सिद्ध कर सकेगा। साथ ही विश्व कल्याण के अपने दायित्व को निभा सकेगा। विचार आधारित विश्व से मानक आधारित विश्व का निर्माण, देश आधारित राष्ट्रवाद से वैश्विक राष्ट्रवाद का उदय, एकात्मकर्मवाद से मानव के शक्ति का विश्व विकास की दिशा में एकीकरण, पावर और प्राफिट के मूल उद्देश्य से मानव मस्तिष्क विकास और शासन प्रणाली के वैश्विक मानकीकरण की दिशा में उदय, देशों के विस्तारवादी और विश्व शक्ति की नीति से समन्वयवादी और विश्व परिवारवाद का उदय, इत्यादि जो कुछ इस मानव समाज और प्रकृति के लिए सत्य-सुन्दर-शिव हो सकता है उस दिशा में उदय।

न्यूनतम प्रभावी हानि – वैश्विक स्तर पर विचार आधारित तानाशाही समाज, तानाशाही राष्ट्रवाद और तानाशाही देश का निर्धारण, नकारात्मक चरित्र के समाज और देश का निर्धारण।

ब. संविधानानुसार पूर्ण गणराज्यों के संघ के निर्माण के लिए

1. संविधान को मानक गणराज्य (ब्रह्माण्डीय गणराज्य-अवतारी परम्परा) के अनुसार करना जिससे भारत एक मानक गणराज्य और लोकतन्त्र का उदाहरण बने सके।
“रामराज्य”, का प्रारूप “परशुराम परम्परा” है। ईश्वर के सातवें अवतार भगवान श्रीराम ने ईश्वर के छठें अवतार भगवान परशुराम  द्वारा दी गई व्यवस्था का ही प्रसार किये थे। 
छठें अवतार भगवान परशुराम द्वारा दी गई व्यवस्था इस प्रकार थी-
1. प्रकृति में व्याप्त तीन गुण- सत्व, रज और तम के प्रधानता के अनुसार मनुष्य का चार वर्णों में निर्धारण। सत्व गुण प्रधान - ब्राह्मण, रज गुण प्रधान- क्षत्रिय, रज एवं तम गुण प्रधान- वैश्य, तम गुण प्रधान- शूद्र।
2. गणराज्य का शासक राजा होगा जो क्षत्रिय होगा जैसे- ब्रह्माण्डीय गणराज्य में प्रकृति जो रज गुण अर्थात् कर्म अर्थात् शक्ति प्रधान है।
3. गणराज्य में राज्य सभा होगी जिसके अनेक सदस्य होंगे जैसे- ब्रह्माण्डीय गणराज्य में प्रकृति के सत्व, रज एवं तम गुणों से युक्त विभिन्न वस्तु हैं।
4. राजा का निर्णय राजसभा का ही निर्णय है जैसे- ब्रह्माण्डीय गणराज्य में प्रकृति का निर्णय वही है जो सत्व, रज एवं तम गुणों का सम्मिलित निर्णय होता है। 
5. राजा का चुनाव जनता करे क्योंकि वह अपने गणराज्य में सर्वव्यापी और जनता का सम्मिलित रुप है जैसे- ब्रह्माण्डीय गणराज्य में प्रकृति सर्वव्यापी है और वह सत्व, रज एवं तम गुणों का सम्मिलित रुप है।
6. राजा और उसकी सभा राज्य वादी न हो इसलिए उस पर नियन्त्रण के लिए सत्व गुण प्रधान ब्राह्मण का नियन्त्रण होगा जैसे- ब्रह्माण्डीय गणराज्य में प्रकृति पर नियन्त्रण के लिए सत्व गुण प्रधान आत्मा का नियन्त्रण होता है।
  यह व्यवस्था जब तक निराकार आधारित लोकतन्त्र में संविधान का स्वरूप ग्राम से लेकर विश्व तक नहीं होता तब तक रामराज्य नहीं बन सकता।
भारत में निम्न्लिखित रुप व्यक्त हो चुका था।
1. ग्राम, विकास खण्ड, नगर, जनपद, प्रदेश और देश स्तर पर गणराज्य और गणसंघ का रुप।
2. सिर्फ ग्राम व नगर स्तर पर राजा (ग्राम व नगर पंचायत अध्यक्ष) का चुनाव सीधे जनता द्वारा।
3. गणराज्य को संचालित करने के लिए संचालक का निराकार रुप- संविधान। 
4. गणराज्य के तन्त्रों को संचालित करने के लिए तन्त्र और क्रियाकलाप का निराकार रुप-नियम और कानून।
5. राजा पर नियन्त्रण के लिए ब्राह्मण का साकार रुप- राष्ट्रपति, राज्यपाल, जिलाधिकारी इत्यादि। 
निम्नलिखित शेष समष्टि कार्य पूर्ण करना है। 
1. गणराज्य या लोकतन्त्र के सत्य रुप- गणराज्य या लोकतन्त्र के स्वरुप का अन्तर्राष्ट्रीय/ विश्वमानक।
2. राजा और सभा सहित गणराज्य पर नियन्त्रण के लिए साकार ब्राह्मण का निराकार रुप- मन का अन्तर्राष्ट्रीय/ विश्वमानक।
3. गणराज्य के प्रबन्ध का सत्य रुप- प्रबन्ध का अन्तर्राष्ट्रीय/ विश्वमानक।
4. गणराज्य के संचालन के लिए संचालक का निराकार रुप- संविधान के स्वरुप का अन्तर्राष्ट्रीय/ विश्वमानक।
5. साकार ब्राह्मण निर्माण के लिए शिक्षा का स्वरुप- शिक्षा पाठ्यक्रम का अन्तर्राष्ट्रीय/ विश्वमानक।

अधिकतम प्रभावी लाभ – अधिकतम अधिकार से युक्त मुख्य/प्रधान संचालक (भारत में प्रधानमंत्री) के सीधे जनता द्वारा चुनाव होने पर वह सच्चे अर्थों में जनता का प्रतिनिधि होगा और सरकार अपने कार्यकाल तक स्थिर रहेगी, सरकार के हटाने का रास्ता बन्द हो चुका होगा जिससे विकास कार्य में बाधा नहीं आयेगी। सदस्यों के खरीद-फरोख्त की अलोकतान्त्रिक रास्ता हमेशा के लिए बन्द हो जायेगा।
न्यूनतम प्रभावी हानि – पार्टी/दल तन्त्र का धीरे-धीरे अवनति।

2. पूर्ण गणराज्य के लिए नगर व ग्राम पंचायत को देश के संविधान की भाँति संविधान देकर गणराज्य बनाते हुये उसका सम्बन्ध सीधे जिलाधिकारी, केन्द्र सरकार और सम्बन्धित मन्त्रालय से करना।

अधिकतम प्रभावी लाभ – “स्वयं का कर्म और स्वयं का परिणाम” के आधार पर पंचायत और निवासी आत्मनिर्भर बनेंगे। पंचायत की सभी वर्तमान स्थिति जिलाधिकारी, केन्द्र सरकार और सम्बन्धित मन्त्रालय के सामने होंगे।
न्यूनतम प्रभावी हानि – पंचायत स्तर के भ्रष्टाचारीयों को नुकसान होगा।

3. राज्यों के विधानसभा को सदैव के लिए समाप्त करना।

अधिकतम प्रभावी लाभ – जन प्रतिनिधियों पर बढ़ते खर्च को कम किया जा सकेगा और विकास कार्य में बेवजह बाधा नहीं आयेगी। 
न्यूनतम प्रभावी हानि – विधानसभा स्तर पर राजनीति को व्यापार बना लेने वालों को नुकसान होगा।

4. संसदीय क्षेत्र का परिसीमन करते हुये सांसद की संख्या कम से कम दो गुना करना।

अधिकतम प्रभावी लाभ – संसदीय क्षेत्र में विकास कार्य पर दृष्टि रखने में सांसदों को आसानी होगी।
न्यूनतम प्रभावी हानि – कुछ भी नहीं ।

5. संसदीय क्षेत्र में सांसद का कार्यालय, संसद सत्र के दौरान दिल्ली केवल अस्थायी निवास के लिए हास्टल। 

अधिकतम प्रभावी लाभ – सांसद के अतिरिक्त खर्च में कमी और अपने संसदीय क्षेत्र पर अधिक ध्यान। जन सम्पर्क में सदैव उपलब्ध रहने का अवसर।
न्यूनतम प्रभावी हानि – अकर्मठ सांसदों को।

6. सांसद प्रत्याशी केवल उसी क्षेत्र का पैत्रिक निवासी और एक चुनाव में केवल एक चुनाव क्षेत्र से ही चुनाव प्रत्याशी बनने की अनुमति।

अधिकतम प्रभावी लाभ – सांसद, जनता से पूर्णतया परिचित। दो स्थानों से चुनाव में आने पर प्रतिबन्ध अर्थात चुनाव खर्च को बचाना।
न्यूनतम प्रभावी हानि – कई स्थानों और कहीं से भी चुनाव में आ जाने वालों का रास्ता बन्द।

7. भारतीय ऋषि आश्रम पद्धतिनुसार सरकारी सेवा का सेवानिवृत्ति की उम्र 50 वर्ष (गृहस्थ आश्रम), फिर 25 वर्ष सम्बन्धित विभाग का मार्गदर्शक मण्डल (वानप्रस्थ आश्रम) में 50 प्रतिशत उपस्थिति अनिवार्य और 50 प्रतिशत वेतन, फिर जीवनपर्यन्त पेंशन और अन्य सुविधाएँ (सन्यास आश्रम)। 

अधिकतम प्रभावी लाभ – कर्मचारीयों की शारीरिक कर्मठता और अनुभव के मार्गदर्शन पर आधारित होने से कार्य कुशलता-पूर्णता में तेजी आयेगी और नये युवा वर्ग को सेवा के अवसर मिलने में भी अधिक अवसर प्राप्त होगा। 50 वर्ष के बाद समाज से जुड़ने का भी अवसर प्राप्त होगा अन्यथा वे विशेष प्रकार के बनकर घर-समाज में अव्यवस्था उत्पन्न करते हैं।
न्यूनतम प्रभावी हानि – अकर्मठ-निकम्में कर्मचारीयों को नुकसान होगा।

8. बढ़ती जनसंख्या और चुनाव एक बहुत बड़ी समस्या है। एक नागरिकता संख्या (इण्टिग्रेटेड सर्किट-चिप युक्त आधार कार्ड) से मतदाता सूची का बार-बार बनाना, चुनाव खर्च में अप्रत्याशित रूप से कमी, मतदान प्रतिशत में अत्यधिक बढ़ोत्तरी, 100 प्रतिशत सत्य मतदाता इत्यादि को मात्र एक साफ्टवेयर से नियंत्रित किया जा सकता है। स्मार्टफोन/इन्टरनेट से आनलाइन मत के साथ ही डिजीटल मत का प्रमाण पत्र मिले जो विकेन्द्रित खुला वेबसाइट पर अपलोड करने की सुविधा हो जिससे दोनों (सरकार और जनता) मत का परिणाम सामने हो।

अधिकतम प्रभावी लाभ – चुनाव खर्च में कमी, अधिकतम मतदाताओं की भागीदारी, परिणाम शीघ्र, पूर्णतया पारदर्शी, मतदाता सूची हमेशा तैयार।
न्यूनतम प्रभावी हानि – चुनाव में भ्रष्टाचार करने वालों पर पूर्ण प्रतिबन्ध।

9. नागरिक के सभी प्रकार के सबसीडी को समाप्त कर सीधे एक न्यूनतम आर्थिक सहायता उनके एक अलग बैंक खाते में मासिक रूप से दी जाये जिसका उपयोग वे केवल दैनिक जीवनयापन के खरीददारी में कर सकें। खरीद की ये वस्तुऐं उसके अपने जिले में निर्मित/उत्पादित होती हों (यहाँ तक की राशन भी वे अपने पंचायत से निर्धारित मूल्य पर ही खरीदें) जिससे “आत्मनिर्भर भारत और लोकल-वोकल” के सिद्धान्त को व्यावहारिक बनाया जा सके। योग्य नागरिक की खोज बैंक में जमा धनराशि से की जा सकती है।

अधिकतम प्रभावी लाभ – जिला स्तर पर उद्योगों का विकास, सरकारी राशन की दुकान का भ्रष्टाचार पूर्णतया बन्द, केवल योग्य नागरिक को ही सबसीडी
न्यूनतम प्रभावी हानि –भ्रष्टाचार करने वालों पर पूर्ण प्रतिबन्ध।

10. सरकारी विभागीय स्तर पर सफाई-सुधार (भ्रष्टाचार समाप्त) करने के लिए पहली गलती पर 1000/-रुपये जुर्माना, दूसरी गलती निश्चित समय में होने पर 5 गुना (5000/-रुपये) जुर्माना, तीसरी गलती पर 10 गुना (20000/-रुपये) जुर्माना राजकोष में जमा करायें। इससे देश की आर्थिक स्थिति ठीक होगी। विभाग का हर कर्मचारी ठीक चलने और सुधार का ध्यान रखेगा। साथ ही गलती करने वाले के परिवार वाले भी सुधरेंगे और गलती करने वाले को, गलती न करने के लिये प्रेरित करेंगे। जबकि सारा परिवार नमकहरामी के पैसे से मौज कर रहा था, तो वह सजा का हकदार भी तो है। जब कम पगार आयेगी, तो परेशानी तो बढ़ेगी ही। जिससे आने वाला नेता भी पहले से सीखें। उसके घर के प्राणी, सम्बन्धी भी गलती करने से रोकें। समाज, जनता, उसकी गलती पर, उसे नफरत की निगाह से देखें। (पुस्तक – “विशाल ज्ञान विज्ञान - सबका समाधान”  में विस्तृत विवरण उपलब्ध)

अधिकतम प्रभावी लाभ – कर्मचारीयों में कर्मठता बढ़ेगी, समयानुसार कार्य पूर्ण होगा, नागरिक में सरकारी कामों के प्रति निगरानी की प्रवृत्ति बढ़ेगी।
न्यूनतम प्रभावी हानि –भ्रष्टाचार करने वालों पर पूर्ण प्रतिबन्ध।

स. गणराज्य के सशक्तता के लिए

01. नगर व ग्राम पंचायत कार्यालय में कम्प्यूटर केन्द्र।
02. प्राथमिक शिक्षा (प्राथमिक विद्यालय), नगर व ग्राम पंचायत के अधीन करना और उसी क्षेत्र के शिक्षक का दैनिक भुगतान के आधार पर भर्ती करना। ताकि निवासी का बच्चा और निवासी शिक्षक, स्वयं का कर्म और स्वयं का परिणाम के अनुसार निवासी में कर्तव्य भावना का विकास हो सके।
03. नगर व ग्राम पंचायत के लाभ-हानि का ब्यौरा सार्वजनिक करना और उस अनुसार ही पिछड़े क्षेत्र पर विशेष ध्यान देना।
04. नगर व ग्राम पंचायत से ही सीधे प्रतिदिन सभी आकड़े केन्द्र को जिससे जनगणना, पशुगणना या अन्य आकड़ों के लिए विशेष अभियान की जरूरत नहीं। कार्ड, भूमि व नागरिक से सम्बन्धित सभी प्रमाण-पत्र नगर व ग्राम पंचायत से ही।
05. कृषि उत्पाद का भण्डारण (गोदाम) ग्राम पंचायत स्तर पर। पंचायत से ही सीधे नागरिक, अन्य पंचायत और भारत सरकार द्वारा खरीददारी एवं भण्डारण।
06. “अतिथि देवो भवः” - नगर व ग्राम पंचायत के द्वारा बाहरी आगन्तुक, खोजकर्ता, आविष्कारक, निराश्रित के लिए “भोजन की गारण्टी” जिसे अन्नक्षेत्र कहते हैं। बाहरी का अर्थ कम से कम 50 किलोमीटर दूर का निवासी। लगातार 2 भोजन से अधिक नहीं, फिर उस पंचायत या 50 किलोमीटर के दायरे के अन्य पंचायत में 7 दिन बाद सम्भव)

द. गणराज्य: एक भारत - श्रेष्ठ भारत के स्थिरता के लिए 

01. नागरिक के मस्तिष्क को आधुनिक, चिन्तनशील, पूर्ण, एकीकृत, समकक्षीकरण व समझ से युक्त करने के लिए “सत्य मानक शिक्षा” से युक्त करना। जिसके लिए राष्ट्रीय लोकतान्त्रिक नागरिक पात्रता परीक्षा (National Democratic Civilian Elegibility Test - NDCET) सरकारी सेवाओं के लिए अनिवार्य करना साथ ही छात्र के लिए अनिवार्य रूप से कभी भी उत्तीर्ण करना आवश्यक तभी उनका शैक्षिक डिग्री मान्य। इस प्रकार शिक्षक पात्रता परीक्षा (Teacher Elegibility Test - TET) अपने आप समाप्त हो जायेगी।
02. भारत के प्रति समर्पित नागरिक निर्माण का पाठ्यक्रम “सत्य मानक शिक्षा” को संविधान का अंग बनाना।
03. एक राष्ट्र - एक पाठ्यक्रम - एक शिक्षा बोर्ड की व्यवस्था क्योंकि शिक्षा का सम्बन्ध राष्ट्र से है न कि राष्ट्र के किसी भाग से।
04. शिक्षा और आवश्यक वस्तु के विपणन क्षेत्र में भारतीय आध्यात्म एवं दर्शन आधारित स्वदेशी विपणन प्रणाली: 3-एफ (3-F : Fuel-Fire-Fuel) अनिवार्य रूप से लागू करना जिससे उनका खर्च ही उन्हें आर्थिक लाभ दे। फलस्वरूप क्रय शक्ति में बढ़ोत्तरी।
05. न्याय क्षेत्र में समय सीमा में बद्ध न्याय और आर्थिक अपराध का दण्ड सर्वोच्च करना।
06. आरक्षण का आधार शारीरिक, आर्थिक व मानसिक करना।
07. नीजी क्षेत्र के विद्यालय और चिकित्सालय के शुल्क को नियंत्रित करना।
08. भूमि विक्रय पंजीकरण, ब्रोकर को दर्ज कराये बिना न करना। ब्रोकर को कानून के दायरे में लाना।
09. एक राष्ट्र - एक बिक्री कर - एक आयकर। सभी कर समाप्त।
10. एक राष्ट्र - एक राष्ट्रीय लोकतान्त्रिक नागरिक संहिता, दण्ड संहिता जो महिला-पुरूष में भेद ना करे।
11. एक राष्ट्र - एक राष्ट्रीय लोकतान्त्रिक धर्म (समष्ठि धर्म) जिसकी सीमा देश स्तर, अन्य प्रचलित धर्म व्यक्तिगत धर्म (व्यष्टि धर्म) जिसकी सीमा परिवार क्षेत्र।
12. एक राष्ट्र - एक नागरिकता संख्या (इण्टिग्रेटेड सर्किट-चिप युक्त आधार कार्ड) - सम्पूर्ण शारीरिक - आर्थिक/संसाधन - मानसिक - क्रियाकलाप - उपलब्धता (नागरिक डाटाबेस), निगरानी अर्थात यात्रा सम्बन्धित टिकट, होटल व थाने से भी जोड़ना।
13. पद पर नियुक्ति के समय न्यूनतम योग्यता को ही अधिकतम योग्यता निर्धारित करना अर्थात जिस पद के लिए जो योग्यता निर्धारित की जाती है, नियुक्ति के समय उम्मीदवार की अधिकतम योग्यता भी वही होनी चाहिए अन्यथा अयोग्य घोषित। नियुक्ति उपरान्त शिक्षा ग्रहण करने की स्वतन्त्रता।
14. भारतीय ऋषि आश्रम पद्धतिनुसार उत्तराधिकार सम्बन्धी अधिनियम जिसमें यह प्राविधान हो कि 25 वर्ष की अवस्था (गृहस्थ आश्रम में प्रवेश) में उसे पैतृक सम्पत्ति अर्थात दादा की सम्पत्ति जिसमें पिता की अर्जित सम्पत्ति शामिल न रहें, पुत्र के अधिकार में हो जाये। 

वेबसाइट पर पंजीकरण करके आप और अधिक जानकारी प्राप्त करे सकते हैं। साथ ही विभिन्न प्रकार के लाभ का विवरण भी देख सकते हैं।
पंजीकरण के उपरान्त ”सम्पूर्ण क्रान्ति - अन्तिम कार्य योजना“ पुस्तक व अन्य पुस्तक का e_book डाउनलोड कर पढ़ें जिसे प्रत्येक भारतीय नागरिक को पढ़ना चाहिए।
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“हमारे युग की दो प्रमुख विषेशताएँ विज्ञान और लोकतंत्र है। ये दोनों टिकाऊ हैं। हम शिक्षित लोगों को यह नहीं कह सकते कि वे तार्किक प्रमाण के बिना धर्म की मान्यताओं को स्वीकार कर लें। जो कुछ भी हमें मानने के लिए कहा जाए, उसे उचित और तर्क के बल से पुष्ट होना चाहिए। अन्यथा हमारे धार्मिक विश्वास इच्छापूरक विचार मात्र रह जाएंगे। आधुनिक मानव को ऐसे धर्म के अनुसार जीवन बिताने की शिक्षा देनी चाहिए, जो उसकी विवेक-बुद्धि को जँचे, विज्ञान की परम्परा के अनुकूल हो। इसके अतिरिक्त धर्म को लोकतन्त्र का पोशक होना चाहिए, जो कि वर्ण, मान्यता, सम्प्रदाय या जाति का विचार न करते हुए प्रत्येक मनुष्य के बौद्धिक और आध्यात्मिक विकास पर जोर देता हो। कोई भी ऐसा धर्म, जो मनुष्य-मनुष्य में भेद करता है अथवा विशेषाधिकार, शोषण या युद्ध का समर्थन करता है, आज के मानव को रूच नहीं सकता। स्वामी विवेकानन्द ने यह सिद्ध किया कि हिन्दू धर्म विज्ञान सम्मत भी है और लोकतन्त्र का समर्थक भी। वह हिन्दू धर्म नहीं, जो दोषों से भरपूर है, बल्कि वह हिन्दू धर्म, जो हमारे महान प्रचारकों का अभिप्रेत था। मात्र जानकारियाँ देना शिक्षा नहीं है। यद्यपि जानकारी का अपना महत्व है और आधुनिक युग में तकनीकी की जानकारी महत्वपूर्ण भी है तथापि व्यक्ति के बौद्धिक झुकाव और उसकी लोकतान्त्रिक भावना का भी बड़ा महत्व है। ये बातें व्यक्ति को एक उत्तरदायी नागरिक बनाती है। शिक्षा का लक्ष्य है ज्ञान के प्रति समर्पण की भावना और निरन्तर सीखते रहने की प्रवृति। वह एक ऐसी प्रक्रिया है जो व्यक्ति को ज्ञान व कौशल दोनों प्रदान करती है तथा इनका जीवन में उपयोग करने का मार्ग प्रशस्त करती है। करूणा, प्रेम और श्रेष्ठ परम्पराओं का विकास भी शिक्षा के उद्देश्य हैं। जब तक शिक्षक शिक्षा के प्रति समर्पित और प्रतिबद्ध नहीं होता और शिक्षा को एक मिशन नहीं मानता तब तक अच्छी शिक्षा की कल्पना नहीं की जा सकती। शिक्षक उन्हीं लोगों को बनाया जाना चाहिए जो सबसे अधिक बुद्धिमान हों। शिक्षक को मात्र अच्छी तरह अध्यापन करके संतुष्ट नहीं हो जाना चाहिए। उसे अपने छात्रों का स्नेह और आदर अर्जित करना चाहिए। सम्मान शिक्षक होने भर से नहीं मिलता, उसे अर्जित करना पड़ता है।” 
- डा0 सर्वपल्ली राधाकृष्णन

  “शोषित वर्ग की सुरक्षा उसके सरकार और कांग्रेस दोनों से स्वतन्त्र होने में है। हमें अपना रास्ता स्वयं बनाना होगा और स्वयं। राजनीतिक शक्ति शोषितों की समस्याओं का निवारण नहीं हो सकती, उनका उद्धार समाज में उनका उचित स्थान पाने में निहित है। उनको अपना रहने का बुरा तरीका बदलना होगा। उनको शिक्षित होना चाहिए। एक बड़ी आवश्यकता उनकी हीनता की भावना को झकझोरने, और उनके अन्दर उस दैवीय असंतोष की स्थापना करने की है जो सभी ऊँचाइयों का स्रोत है। शिक्षित बनो!!!, संगठित रहो!!!, संघर्ष करो!!! सामाजिक क्रान्ति साकार बनाने के लिए किसी महान विभूति की आवश्यकता है या नहीं यह प्रश्न यदि एक तरफ रख दिया जाय, तो भी सामाजिक क्रान्ति की जिम्मेदारी मूलतः समाज के बुद्धिमान वर्ग पर ही रहती है, इसे वास्तव में कोई भी अस्वीकार नहीं कर सकता। भविष्य काल की ओर दृष्टि रखकर वर्तमान समय में समाज को योग्य मार्ग दिखलाना यह बुद्धिमान वर्ग का पवित्र कर्तव्य है। यह कर्तव्य निभाने की कुशलता जिस समाज के बुद्धिमान लोग दिखलाते हैं। वही जीवन कलह में टिक सकता है। सही राष्ट्रवाद है, जाति भावना का परित्याग। सामाजिक तथा आर्थिक पुनर्निर्माण के आमूल परिवर्तनवादी कार्यक्रम के बिना अस्पृश्य कभी भी अपनी दशा में सुधार नहीं कर सकते। राष्ट्रवाद तभी औचित्य ग्रहण कर सकता है जब लोगों के बीच जाति, नस्ल या रंग का अन्तर भुलाकर उसमें सामाजिक समरसता व मातत्व को सर्वोच्च स्थान दिया जाय। राष्ट्र का सन्दर्भ में राष्ट्रीयता का अर्थ होना चाहिए- सामाजिक एकता की दृढ़ भावना, अन्तर्राष्ट्रीय सन्दर्भ में इसका अर्थ है-भाईचारा। शिक्षा प्रत्येक व्यक्ति का जन्मसिद्ध अधिकार है अतः शिक्षा के दरवाजे प्रत्येक भारतीय नागरिक के लिए खुले होने चाहिए। एक व्यक्ति के शिक्षित होने का अर्थ है- एक व्यक्ति का शिक्षित होना लेकिन एक स्त्री के शिक्षित होने का अर्थ है कि एक परिवार का शिक्षित होना।”   
 - बाबा साहेब भीम राव अम्बेडकर 




11 comments:

  1. भारत की सम्पूर्ण क्रांति को सफल बनाने के लिए सभी भारतवासियों को अपनी सहभागिता देना अनिवार्य है । सरकारों पर ही निर्भर रहना से लक्ष्य की प्राप्ति होना असंभव है ।
    देश मे बैठे देश का ही खा कर देश को ही बर्बाद करने वालों गद्दारों पर जब तक अंकुश नही लगाया जाएगा । जब देश मे जातिवाद ,क्षेत्रवाद और निजिस्वार्थ की राजनीति रहेगी जनता चुनाव में अपना मत जब तक राष्ट्रहित में नही करेंगे और किसी लालचबस अपना मत करेंगे तो कैसे सम्पूर्ण क्रांति विकास पथ पर देश को ले जाये जाएगा । वर्तमान सरकार अपने कार्य का निर्वाह सकुशलता से कर रही है । बस अब कुछ तथाकथित लोगों पर अंकुश लगाया जाये जो समाज में अपने निजी राजनीति एवं स्वयं के लाभ हेतु समाज मे देश और सरकार के खिलाफ भ्रांतियां फैलाते है ।

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  2. मैं अपने देश की सेवा के लिए हमेशा तत्पर हूँ।
    🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳जय हिंद 🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳

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  3. अति सुन्दर 🇮🇳🇮🇳जय हिंद 🇮🇳🇮🇳

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  4. जय भारती उत्तम सेवा के लिए आभार
    https://thepanchali.blogspot.com/2020/10/meri-vasundhra-poem-including-narendra.html

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  5. सही बात कही गयी है।
    विकास हर नागरिक के दरवाजे से सुरु हो। जो नही हो रहा है चाहे गांव हो या शहर। जनता प्रधानों व सभासदों की कठपुतली बन के राह गई है।

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  6. सत्य की जीत हमेशा अंत में ही होती है जब झूठ परेशान होकर थक-हारकर बैठ जाता है। हमें गर्व है कि हमारे देश का नेतृत्व एक ऐसे कुशल व्यक्ति के हाथों में है जिसके मनसा वाचा कर्मणा में एकरूपता देखने को मिलती है। आशा ही नहीं बल्कि पुर्ण विश्वास के साथ कह सकता हूं कि आगामी कुछेक सालों में हमें एक नया भारत देखने को मिलेगा। हमें अपना विश्वास बनाए रखने की एवं नव-भारत निर्माण में अपने सामर्थ्य अनुसार सहभागिता सुनिश्चित करने की आवश्यकता है। हम मंजिल के निकट पहुंच गए हैं। हमारा नया भारत विश्व का मार्गदर्शन करेगा।

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